Bhagwat Geeta: 1

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The second read of the book Bhagwat Geeta to research for the next book given these eleven useful thoughts that hit with the cord. There are many more but these are the first eleven that looked interesting. A loose English translation is also given.

हे कुंतीपुत्र! सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अंतर्ध्यान होना शर्दी तथा गर्मी की ऋतुओ के आने जाने के समान है। हे भरतवंशी! वे इन्द्रियबोध से उत्पन्न होते है और मनुष्य को चाहिए कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखें।

Hey Kuntiputra! The cycle of happiness and misery is just like the cycle of winter and summer. Hey Bharatvanshi! These are originated from the sense of senses and humans need to tolerate them steadily.

एक छोटे से कूप का सारा कार्य एक विशाल जलाशय से तुरंत हो जाता है। इसी प्रकार वेदों के आंतरिक तात्पर्य जानने वाले को उनके सारे प्रयोजन सिद्ध हो जाते है।

All the work of small pond is fulfilled immediately by vast water body, similarly by knowing the basic meaning of Veda every goal can be achieved.

हे अर्जुन! जय अथवा पराजय की समस्थ आसक्ति त्याग कर संभाव से अपना कर्म करो। ऐसी समता योग कहलाती है।

Hey Arjun! get over victory and defeat and do your work steadily. This type of skill is called Yog.

अतः हे महाबाहु! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयो से सब प्रकार से विरत होकर उसके वश में है, उसी की बुद्धि निसंदेह स्थिर है।

So, hey Mahabahu! The person who controls his/her senses by detaching them from there subject, his/her mind is steady.

दूसरी ओर यदि कोई निष्ठावान व्यक्ति अपने मन के द्वारा कर्मेन्द्रियों को वश में करने का प्रयत्न करता है और बिना किसी आसक्ति के कर्मयोग प्रारम्भ करता है, तो वह अति उत्कृत्त है।

On the other hand, if some loyal person tries to control his/her senses with his/her mind and start Karmayog without any attachement then it is full of excitement.

महापुरुष जो जो आचरण करता है, सामान्य व्यक्ति उसी का अनुसरण करते है। वह अपने अनुसरणीय कार्यो से जो आदर्श प्रस्तुत करता है, सम्पूर्ण विश्व उसका अनुसरण करता है।

Great people whatever do, common people follow it. Whatever example he set by his/her recommendable work, the whole world follows the same.

कर्मेन्द्रियाँ जड़ पदार्थ की अपेक्षा श्रेष्ठ है, मन इन्द्रियों से बढ़कर है, बुद्धि मन से भी उच्च है और वह (आत्मा) बुद्धि से भी बढ़कर है।

Living senses are superior to non-living, Mind is superior to living senses, intelligence is superior to the mind, and he/she (soul) is superior to intelligence.

अपने नियत्कर्मो को दोषपूर्ण ढंग से सम्पन्न करना भी अन्य के कर्मो को भलीभांति करने से श्रयकर है। स्वीय कर्मो को करते हुए मरना पराये कर्मो में प्रव्रत्त होने की अपेक्षा श्रेष्ठतर है, क्योंकि अन्य किसी के मार्ग का अनुशरण भयावह होता है।

Doing our daily works ineffectively is better than doing others work effectively. Even dying while doing the work undertaken by us is better than doing work stated by others because living according to others terms is dangerous.

जो भक्तिभाव से कर्म करता है, जो विशुद्ध आत्मा है और अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में रखता है, वह सबो को प्रिय होता है और सभी लोग उसे प्रिय होते है। ऐसा व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कभी नही बंधता।

One who works with complete faith, who is pure soul and control senses with his/her mind, is loved by all and love everyone. This type of people does not get attached even while doing work.

जो लोग संशय से उत्पन्न होने वाले दैत्य से परे है, जिनके मन आत्म-साक्षात्कार में रत है, जो समस्त जीवों के कल्याणकार्य करने में सदैव व्यस्त रहते है और जो समस्त पापो से रहित है, वे ब्रम्हनिर्वाण को प्राप्त होते है।

Those who are beyond doubt, whose mind is busy in self-analysis, who is always busy in social welfare, who is beyond all sins, they achieve Bhramhanirvan.

हे कुंतीपुत्र! मैं जल का स्वाद हु, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हु। वैदिक मंत्रों में ओंकार हु, आकाश में ध्वनि हु तथा मनुष्य में सामर्थ्य हु।

Hey Kutiputra! I am the taste of water, the light of the sun and the moon. Omkar in a Vedic mantra, sound in the sky, and ability in humans. (this line says that humans are respected for there ability to accomplish tasks.)

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